Sunday, April 4, 2010

कल रात मैंने एक सपना देखा

सपनों की कोई सरहद नहीं होती इसलिए जो जागते हुए दिल नहीं सोच पाता, सपनों में अकसर वो ख्याल आ जाते हैं। ऐसा ही एक ख्याल लिख रहा हूं।


कल रात मैंने एक सपना देखा
पहली बार इस सपने में न कोई लडकी थी
न यार दोस्त थे और न मां-बाप थे।
इन सबसे कुछ हटकर कल रात मैंने एक सपना देखा
इस सपने में मैंने भारत देश अपना देखा


आज़ादी की लड़ाई भी देखी, शहीदों की चिताएं भी देखी
सेनानियों का जुनून देखा और आज़ादी का सुकून देखा
देश की करंसी पर बैठे उन महान नेताओं को देखा
जिन्होंने आज़ाद मुल्क को दो टुकड़ों में फेंका
स्वतंत्रता संग्राम के उन सेनानियों को देखा
जिन्होंने सिर पर लाठियां और सीने पर गोलियां खाई
तो देखा इस महासंग्राम के उन नेताओं को भी
जिन्हें कभी खंरोच तक नहीं आई
जो इज्ज़त इस देश ने बलिदानों से पाई थी
वो इज़्ज़त इन चंद नेताओं ने मिट्टी में मिलाई थी
जिस आज़ादी को सींचा था नौजवानों ने अपने ख़ून से
वो आज़ादी राष्ट्रपिता ने हमें भीख़ में दिलवाई थी

इन चंद पहलुओं का इतिहासकारों की नज़रों से बचना देखा
कल रात मैंने एक सपना देखा
इस सपने में मैंने भारत देश अपना देखा

........पूरी कविता के लिए इस लिंक पर क्लिक करें........ http://anuragdhanda.blogspot.com/

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