Saturday, June 13, 2009

मैं पूछ नहीं सका.....


पत्रकारिता की हमारी दुनिया में हादसे देखना या लाशों के बीच से यू गुज़र जाना जैसे आम आदमी बाज़ार से गुज़र रहा हो......अमूमन ये सब होता रहता है और हम इसे अपना काम समझ कर करते भी रहते हैं......किसी की मौत पर मातम हो तो भी ये एक पत्रकार की हिम्मत ही है जो उसे मरने वाले के परिवार वालों का इंटरव्यू करने का हौसला देता है। सुबकियां लेते लोगों से सवाल पूछना हमारे पेशे का हिस्सा है मगर आज मैं अपने पेशे से इंसाफ़ नहीं कर पाया। आज मैं घंटों तक एक बाप के लिए तड़पती इन आंखों से इतना भी नहीं पूछ पाया कि क्या वो बात करने की हालत में है ? या फिर ये कि क्या वो अपने पापा के बारे में बात करना चाहती भी है ?
एक पत्रकार के तौर पर शायद ये मेरी नाकामयाबी है मगर मैं इसे भूलना नहीं चाहता। इस नाकामयाबी को ताउम्र याद रखने की ख्वाहिश ने ही मुझे इस चेहरे को तस्वीर में कैद करने पर मजबूर कर दिया। हर बार तस्वीर देखते ही वो बुदबुदाते होठ याद आते हैं......चंद कदम दूर से ये अहसास हो रहा था कि वो पापा पापा बुदबुदा रही है और ताबूत में रखे अपने पापा के शरीर के टुकड़ों को छू लेने की आस में ताबूत को सहला रही है। मैं सोचता रहा दिनभर कि मैंने ऐसा क्यूं किया? क्यूं आखिर सवाल ज़ुबां तक नहीं आया ? दिल के जवाब से संतुष्ट नहीं हूं मैं......संतुष्ट हो भी कैसे जाऊं आखिर सवाल पूछना मेरा पेशा है.....

Thursday, May 21, 2009

वाह! क्या पोज़ है......

कई बार इंसान कुछ बेहतरीन हासिल करने के चक्कर में दुनिया को कुछ बेहतरीन दे जाता है। अब इन जनाब को ही ले लीजिये......कैमरे में एक बेहतरीन शॉट कैद करने के चक्कर में ये खुद एक कैमरे में बेशकीमती पल बन कर कैद हो गये। आप ही बताईये मिलेगा कहीं इससे बेहतर पोज़....

Tuesday, May 12, 2009

शादी से डर लगता है.....

आज घर गया तो मां तलवार लिये खड़ी थी
तलवार मतलब आंसुओं की तलवार
कहा कि अब उम्र हो चली है
तू शादी कर ले....

कैसे कहूं कि शादी से डर लगता है
एक नये ख्वाब की आबादी से डर लगता है

कैसे कहूं कि ज़िंदगी के उस मोड़ से आगे निकल आया हूं
जब किसी लड़की को झूठे दिलासे दे सकता था
अपने सपनों को अधूरा छोड़
किसी की ख्वाबों की दुनिया सजा सकता था
कैसे कहूं कि कायर बन गया हूं
दुनिया की आपाधापी में
किसी पर हक जताने से डर लगता है
कैसे कहूं किसी को अपना बनाने से डर लगता है।

कैसे कहूं कि शादी से डर लगता है
एक नये ख्वाब की आबादी से डर लगता है।

ज़िम्मेदारी बड़ी है, मुझे लगता है
मैं छोटा रह गया हूं
दौलत की इस दुनिया का उसूल नहीं सीखा
एक सिक्का हूं और खोटा रह गया हूं
कैसे कहूं कि ज़ख्मों से भरी इस दुनिया को
नया घाव कैसे दे दूं
अभी तक लड़खडा रहा हूं होश में भी
मदहोशी की दवा को मुकाम कैसे दे दूं?
कैसे कहूं कि मां तेरे आंसू नहीं देखे जाते
मगर तू ही बता तेरे आंसुओं के बदले
किसी और की आंखों में सैलाब कैसे दे दूं
मैं ये हौसला कर भी लूं अगर
तुझे खुशियों का भरोसा कैसे दे दूं
जो आंसू तेरी पलकों पे रुका सा है
उसे बहने का मौका मैं कैसे दे दूं?

कैसे कहूं कि शादी से डर लगता है
एक नये ख्वाब की आबादी से डर लगता है।

कैसे समझाऊं तुम्हें नयी ज़िंदगी मेरी
तुम्हारे पुराने ख्यालों से डर लगता है
मजहब के जिस सवाल पर लड़ रहा है हर कोई
उसे घर की चौखट तक लाने में डर लगता है
कैसे बताऊं तुम्हें कि इस मतलबी दुनिया में
एक नयी दुनिया बसाने से डर लगता है।

कैसे कहूं कि शादी से डर लगता है।
एक नये ख्वाब की आबादी से डर लगता है।

Monday, September 29, 2008

एक शाम दोस्तों के नाम

VISUAL PATH....F/SUN/DEL/SWATI'S MOBILE (एक तस्वीर को छुपाते हुए)

STD .... साढे दस बजे एक मशहूर अफवाह चैनल के कुछ लोग पार्टी के लिये बॉस की नाराज़गी झेलते गुडगांव सहारा मॉल के बेसमेंट में मिले। सोचिये यमुना नदी के बढते जल स्तर पर घंटों नज़र गडाये रखने के बाद कैसा होगा पार्टी का माहौल........

मोंटाज से शुरु करें......(15 सैकेंड के भद्दे शॉट्स)
वीओ-1......मदहोश हसीनाओं के बीच झूमते शराबी दीवाने........ये नज़ारा किसी डांस बार का नहीं बल्कि दोस्तों की एक महफिल का है। जिसमें देर रात कई युवा लडके लडकियां 550 रुपये हाथ में लिये जा पहुंचे गुड़गांव के एक टुच्चे नचेडे स्थान पर।

बाइट....प्रबुद्ध, जूस के नशे में झूमा हुआ नशेडा ( मैं नाचूंगा खूब नाचूंगा .....नहीं रुकूंगा....लेकिन नाचूंगा सिर्फ गौरव की बाहों में. ई....ही....हे....हिच)

वीओ-2....इस मस्ती भरी महफिल में भी एक शख्स सबसे अलग दिखा। शक्लो सूरत में अजीब....मदिरा को सूंघते ही झूमने वाला ये शख्स किसी का दीवाना हो चला था।

बाइट......चश्मदीद (मैंने देखा सब देखा वो चांस पर डांस करने की फिराक में था )

वीओ-3....लास्ट चांस में हुआ ये भौंडा प्रदर्शन नाम के मुताबिक आखिरी मौका कतई नहीं था। ऐसा ही एक और मौका आने वाले शनिवार को तलाशने की कोशिश की जा रही है।

पीटीसी..... (कौन कहता है कि मैं डरता हूं ज़माने से
रोज़ सुबह महबूबा को पुकारता हूं पाखाने से........वाह वाह, वाह वाह.........
कैमरा पर्सन स्वाति और टीका टिप्पणी में सहयोगी मीतू पंत के साथ अनुराग ढांडा)

खबर का असर.......चार लोग बीमार....दो दिल के घायल और कुछ मौके के कायल

स्लग-
झूम चुस्की झूम लट्टू

550 रुपये में ऐश

चांस पर डांस

फिर मिलेगा मौका (चांस पर डांस करने का)

Saturday, September 13, 2008

देर आये दुरुस्त आये......

ज़िन्दगी की भागदौड़ में कब दिल और दिमाग सोचना बंद कर देते हैं ये पता ही नहीं चलता। मकसद अगर आंखों के सामने हो और ऊंचाई पर पहुँचने की ख्वाहिश दिल में... तो फिर ज़िन्दगी मशीनी हो जाती है। अब देखिये न नौ महीने का वक्त गुजर गया लेकिन इस बीच दिल की बात 'अधूरा ' पर लिखने के लिए कुछ लम्हे तक नहीं जुटा पाया। हाँ, एक बात ज़िन्दगी से ज़रूर सीखी है और न जाने कितनी ही बार आजमा भी चुका हूँ कि.....देर आये दुरुस्त आये। इसलिए एक बार फिर से कोशिश कर रहा हूँ शब्दों की कड़ियां नए सिरे से जोड़ने की। या फिर यूँ कहें कि एक अधूरे प्रयास को पूरा करने की एक और कोशिश कर रहा हूँ।

अधूरा में आपका एक बार फिर स्वागत है।

Saturday, November 10, 2007

माफ़ीनामा ........

मुझे मालूम हुआ कि जिस मित्र की यह तस्वीर है वो इसे ब्लाग पर जारी करने से बेहद नाराज़ है। मेरा मकसद केवल चंद चेहरों पर मुस्कुराहट लाना था। फिर भी यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो मैं माफ़ी चाहता हूँ। इसे एक दोस्त का मजाक समझ कर नज़रंदाज़ करें।

Friday, October 26, 2007

ऐसा भी क्या सोना यार !!!

दिन में ज्यादा खाने का साइड इफेक्ट, वैसे इनका कहना है की ये गलत समय पर कोई काम नहीं करते हैं जैसे निशाचर वेला यानि कि रात के वक़्त ये भूखे हों तो भी नहीं खाते हैं, इसी तरह गलत चीज़ें देखते भी नही हैं लेकिन ये चूंकि दिन का वक़्त था तो खा भी ज्यादा लिया और मूड था तो गन्दी-गन्दी बोलते-बोलते 'दिल दोस्ती .....' भी देख ही ली। और मन मुताबिक दोनो काम हो जाने के बाद ज़रा इनका सोने का अंदाज़ देखिए...............


Tuesday, October 23, 2007

क्या मैं रावण हूँ ?

रावण दहन का मौका था और जल मैं गया ..........शायद इसलिए ये सवाल दिमाग में आया अब ज़रा उस जगह का नज़ारा सुनिए जहाँ पाप के प्रतीक रावण को फूकने का कार्यक्रम था हज़ारों लोगों की भीड़ और जलने वालों में रावण, मेघनाथ, कुम्भकर्ण, ब्लूलाइन और मैं खैर हादसा क्या था, क्या हुआ वो सब बाद में बताऊंगा लेकिन उससे पहले और बाद में जो कुछ हुआ वो उससे कहीं ज्यादा रोचक है हादसे से कुछ देर पहले मैं सोच चुका था कि इस मौक़े पर कैमरे के सामने क्या बोलूँगा

पी टी सी:- दिल्ली में कई जगह रावण दहन के मौक़े पर पुतले तीन नहीं बल्कि चार जलाये गए रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतले तो हर साल की तरह जलाए ही गए बदलते वक़्त के साथ- साथ अपनी करतूतों की वजह से कुछ और नाम भी खलनायकों की इस लिस्ट में जुड़ गए हैं

यकीन जानिए उस वक़्त मुझे आभास भी नही था कि इस लिस्ट में मेरा भी नाम जुड़ चुका है
खैर हुआ वही जो होनी को मंज़ूर था और ब्लू लाइन के पुतले से एक बड़ा टुकडा मेरी पीठ से आकर टकराया, लगा मानो किसी ने धक्का दिया हो सहलाने के लिए पीठ पर हाथ फिराया तो पीछे से पूरी कमीज़ गायब हो चुकी थी तब पहला एहसास हुआ कि हुआ क्या है इस वक़्त तक वहाँ भगदड़ मच चुकी थी खैर मैं वहाँ से फस्ट एड के लिए निकला, बाद में कैमरा पर्सन से पूछा कि क्या उसने उस वक़्त के विज़्युअल लिए थे तो पता चला कि भगदड़ में भाई साहेब भी गिरे पड़े थे और कैमरे का मुँह आसमान की तरफ था

हादसा आजतक के रिपोर्टर के साथ हुआ था इसलिए मैनेजमेंट के होश उडे हुए थे इलाक़े के मशहूर सर्जन को बुलाया गया और उसने दवा दारु के बाद ४-५ दिन का बेड रेस्ट बता दिया तब से जैसे मानव योनि समाप्त हो गयी हो कभी कुत्तों की तरह हाथ पांव फैला कर पेट के बल सो रहा हूँ तो कभी घोड़े की तरह खडे खडे सोने की कोशिश करता हूँ आज पता चला क्यों कहा जाता है कि मैदाने जंग में कभी पीठ पर घाव नहीं खाना चाहिये इसका कायरता से कोई संबंध नहीं है इसका सीधा संबंध बाद की भयावह परिस्थितियों से है जो आजकल मैं भुगत रहा हूँ

घटना के बाद एक दोस्त ने सहानुभूति जताने के लिए मोबाइल पर जो संदेश भेजा वो कुछ इस तरह था......................... "दुनिया में आत्महत्या के कई तरीके हैं जैसे ज़हर खाना, फांसी लगाना, ट्रेन की पटरी पर सो जाना......लेकिन हमने सबसे अच्छा तरीका चुना है ---Journalism"

Monday, October 15, 2007

ये कैसा आतंकवाद....

सोचा था नहीं लिखूंगा....बेवजह अपने शब्दों को ऐसे लोगों के लिये ज़ाया नहीं करुंगा जिनमें इंसानियत बची ही नहीं है। अजमेर शरीफ़ में धमाका हुआ मैनें नहीं लिखा लेकिन जब दूसरा धमाका लुधियाना में हुआ तो खुद को लिखने से नहीं रोक पाया। कुछ लोग कहते हैं ये कि ये कश्मीर की लडाई है तो कुछ ने कहा ये लोग नाराज़ हैं सरकार से। लेकिन अगर नाराज़गी सरकार से है तो धमाके सरकारी दफ्तरों की बजाय दरगाहों और सिनेमा हॉल में नहीं हो रहे होते। मेरी नज़र में ये वो कायर हैं जो सरकार से टकराने की हिम्मत तो नहीं जुटा पाते लेकिन अपना ताकत ज़रूर साबित करना चाहते हैं और इसके लिये मासूमों को अपना निशाना बनाने से भी नहीं चूकते। इनसे बेहतर तो वो आतंकवादी थे जिन्होंने अपनी बात इस बुलंद आवाज़ में रखी कि सरकार हिल उठी थी। बेशक लोगों की नज़रों में उन्हें कहीं बड़ा आतंकवादी बता कर पेश किया गया था लेकिन हक़ीकत में वो पांच (या छह) कम से कम एक मकसद के लिये तो लड़ रहे थे और सामने से लड़ रहे थे। लेकिन खुद को आतंकवादी समझने वाले ये कायर अगर किसी दिन पुलिस के हत्थे चढ गये तो ...............

Friday, September 14, 2007

देवी बोली राम राम!

जय श्री राम!
हाँ भाई बोलना पड़ता है वर्ना हिंदुवादी संगठन नाराज हो जायेंगे और लगेंगे सड़क जाम करने ......लेकिन बोल कर भी तो यूपीए सरकार से नाराजगी मोल ले ही ली है क्योंकि सरकार की मानें तो रामायण, राम ये सब कहानियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं रामसेतु मामले में कोर्ट में दिया गया सरकार का बयान जानकर आश्चर्य हुआ इतना तो समझ आ गया कि लेफ्ट किसी भगवान् में विश्वास नहीं करता और कोर्ट में कही गयी भाषा कॉंग्रेस की कम और लेफ्ट की ज्यादा लग रही थी लेकिन परमाणु मुद्दे पर लेफ्ट को टका सा जवाब देने वाली कॉंग्रेस इस मामले में कैसे राज़ी हो गयी ये ज़रूर तहकीकात का विषय था समझने का विषय ये भी था कि राम का मुद्दा दोबारा बीजेपी के हाथ में देने की मूर्खतापूर्ण हरकत कॉंग्रेस जैसा राजनैतिक रुप से परिपक्व दल कैसे कर सकता हैखैर मुद्दा हाथ आते ही हिंदुवादी संगठनों ने सारे देश में हाहाकार मचाने की तैयारी शुरू कर दी लेकिन इससे पहले कि राम नाम लोगों के दिलों से निकल कर सडकों पर आता देवी का अवतार लेकर सोनिया गाँधी अवतरित हो गयी देश से जुडे अधिकतर मुद्दों पर खामोश रहने वाले मुख से चंद शब्द फूटे और तुरंत कॉंग्रेस की तरफ से बयान आने लगे कि राम के बारे में कही सब बातें वापस ली जायेंगी सब यही बात कर रहे थे कि सोनिया गाँधी ने सही समय पर सही बात बोली तब ये ख़याल मेरे दिमाग में आया कि मंत्री से लेकर संतरी तक जिस दर पर माथा टेकते हैं उस दर तक इतनी बड़ी बात कोर्ट में कहे जाने से पहले न पहुंची हो ये कैसे मुमकिन है और ये ख़याल आते ही पूरी तस्वीर साफ नज़र आने लगी समझ आने लगा कि किस तरह राम के नाम पर लोगों को दोबारा बेवक़ूफ़ बनाया गया है और जिस राम नाम का इस्तेमाल कर पहले बीजेपी ने फ़ायदा उठाया था आज उसी का इस्तेमाल आम लोगों कि नज़रों में देवी गाँधी का क़द बढ़ाने के लिए किया गया है आने वाले चुनावों के लिए रणनीतिक तैयारी शुरू हो गयी है, परमाणु मुद्दे से चुनावी तैयारी का बिगुल जो लेफ्ट ने बजाया था सोनिया ब्रिगेड ने दुदुम्भी बजा कर उसका जवाब दे दिया है कुछ लोगों का बेशक ये मनाना है कि इस मुद्दे के उठने से बीजेपी को फायदा होगा मगर हकीकत में इस गहरी चाल को शायद ही कोई समझ पा रहा है पुरातत्व विभाग के पूर्व संयुक्त निदेशक के ऍन दीक्षित से मुलाक़ात हुई तो जिज्ञासावश पूछ बैठा कि रामसेतु की हक़ीकत जानना क्या वाकई संभव नही है तो जवाब मेरी उम्मीद के विपरीत ही था कि अगर सरकार चाहे तो एक सर्वे करवा कर चंद दिनों में सच्चाई सामने आ सकती है पर फिर मैंने सोचा कि अगर सच्चाई ही सामने लानी होती तो ये तमाशा ही क्यों होता?

Monday, September 10, 2007

पत्रकारिता या कमीनापन!

आज एक बूढे बाप की स्टोरी कर रहा था जिसका बेटा सोलह साल पहले डीटीसी बस की चपेट में आ गया था। जैसे-जैसे इस स्टोरी पर आगे बढता गया व्यवस्था से घृणा सी होने लगी। लेकिन ऐसा कुछ पल के लिए था। आखिर मैं भी उस व्यवस्था का एक हिस्सा ही था। मैं और कैमरामैन कुछ देर बाद गाड़ी में ये ज़िक्र कर रहे थे कि किस चालाकी से हमने उस बूढे बाप से उसके बेटे का ज़िक्र कर पहले उसे रुलाया और फिर उसे रोते हुए शूट कर लिया ताकि कहानी मार्मिक हो सके। और सच भी तो है जब तक स्क्रीन पर कोई रो चिल्ला ना रहा हो, तब तक टीवी देखता कौन है। मगर कुछ भी कहिये कहानी में दम तो ज़रुर था। उन बूढे मां बाप का सोलह साल तक कोर्ट के चक्कर लगाना वो कारण नहीं था जो मुझे उस वक्त परेशान कर रहा था। मैं ये सोचकर परेशान था कि जब-जब ये लोग कोर्ट में गये होंगे या मुआवजे का ज़िक्र आया होगा तब-तब उन्हें उनका इकलौता बेटा भी याद आया होगा और हर बार आंसू आंख से चाहे ना बहे हों दिल तो ज़रुर रोया होगा। सवाल मन में हज़ारों थे लेकिन मेरे पास एक का भी जवाब नहीं था। मुझे अच्छी तरह मालूम था कि मैं चाहे कितनी भी अच्छी स्टोरी क्यों ना कर लूं यहां कुछ बदलने वाला नहीं है। हां अच्छी स्टोरी के लिए कुछ लोगों से वाहवाही ज़रुर मिल जायेगी लेकिन जब कोई इस स्टोरी की तारीफ़ करेगा तो इसका मतलब किसी पर तो इसका असर हो ही रहा है। कुछ और ना सही कम से कम लोगों का ये वहम तो टूटेगा कि अदालतों में अकसर इंसाफ़ मिल जाया करता है। काश मुआवजा मिलने से पहले ये बूढा बाप मर जाये यही सोचते सोचते स्क्रिप्ट की आखिरी पंक्ति भी लिख डाली।

Saturday, September 8, 2007

अधूरा में आप सबका स्वागत है!

ब्लॉग की दुनिया में एक अधूरा सा कदम रख रहा हूँ! पत्रकारिता की दुनिया से हूँ इसलिये उसी ओर की बातें हो सकता है कुछ ज्यादा हों! लेकिन ये मंच महज़ पत्रकारिता से जुड़ा हो ऐसा नहीं है जिसे भी विचारों की खुजली हो यहाँ आकर अपनी खुजली मिटा सकता है! बाकी रही पत्रकारिता की बात तो ख़बरिया चैनलों में कहां अब पत्रकारिता बची है बस एक अधूरा सा ख़्वाब है जो हम जैसे लोग अपनी आंखों में लिए टेलिविज़न के इस भूलभुलैया में चले आये हैं ये सोच कर कि हम इस अंधेरगर्दी को ख़त्म करेंगे, पर सच कहूं तो चंद महीनों के थोड़े से वक़्त में ही ये एहसास हो गया है कि काम इतना आसान भी नही है जितना हम सोच बैठे थे! ना चाहते हुए भी इस थोड़े से वक़्त में इस कीचड का हिस्सा बने रहने के लिए वो सब कुछ किया है जिससे कभी नफरत किया करते थे! और कुछ महीने पहले तक ये कहने वाला इन्सान कि ऐसे कैसे चलता है अब कभी कभार ये कहने लगा है कि सब चलता है यार !